पेड़ से बातचीत

एक अजनबी संवाद: पेड़ की अंतिम चेतावनी

दोपहर की उस तपती धूप में, जब इंसान साये की तलाश में भटकता है, मैं एक पुराने पेड़ के नीचे जा बैठा। कड़कती धूप और गर्म हवाओं के बीच भी वह पेड़ शांत खड़ा था, मानों वह किसी तपस्या में लीन हो। मैंने गौर से उसकी शाखाओं को देखा, उसकी झुर्रीदार छाल को छुआ और सहसा ही एक सवाल मेरे मन में कौंधा— "आखिर तुम खाते क्या हो भाई, जो इस भीषण गर्मी में भी इतनी शीतलता बांट रहे हो?"

Green Tree in Sunlight

मैं काफी देर तक इसी उधेड़बुन में था, तभी एक गहरी और गूँजती हुई आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। वह आवाज़ किसी इंसान की नहीं, बल्कि उसी शांत खड़े वृक्ष की थी।

"भाई, तुम अकेले ये सोच के क्या जताना चाहते हो कि मैं अपना कर्तव्य छोड़ दूँ? जैसे तुम लोगों ने छोड़ दिया?"

उसकी यह बात किसी तीर की तरह मेरे सीने में जा लगी। मैं निशब्द हो गया। हम इंसान ही तो हैं जो स्वार्थ में अंधे होकर जंगलों को कंक्रीट के ढेरों में बदल रहे हैं। हमने अपना कर्तव्य बहुत पहले छोड़ दिया था, पर यह प्रकृति आज भी अपनी मर्यादा में है।

निस्वार्थ प्रेम और हमारा स्वार्थ

मेरी नजरें शर्मिंदगी से झुक गईं। मैं वहां से भागना चाहता था, पर उसने फिर पुकारा— "अरे भाई! कहाँ जा रहे हो? थोड़ा सुस्ता लो। मैं तुमसे कोई टैक्स नहीं लूँगा। मेरा प्यार मुफ़्त है, निस्वार्थ है। मैं तुमसे कोई मूल्यवान चीज़ नहीं मांगता, बस तुम्हें शीतलता देना चाहता हूँ। क्या तुम्हें इसमें भी संतुष्टि नहीं?"

Majestic Forest
"रुको लिटिल ब्लॉगर! तुम सबकी व्यथा लिखते हो, मेरी भी लिख दो। लोगों को बता दो कि मुझे उनकी नहीं, बल्कि उन्हें मेरी ज़रूरत है। वे मुझे खोकर मृत्यु मार्ग अपना रहे हैं।"

उस वृक्ष की चेतावनी गंभीर थी। उसने कहा कि उसके जाते ही इस सुंदर सृष्टि की शोभा नष्ट हो जाएगी, चारों तरफ अकाल और मृत्यु का कुशासन होगा। इंसान अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए ज़हर बो रहा है। आज हम जिस ताजी हवा को मुफ़्त समझ रहे हैं, कल उसके लिए हमें अपनी जान की कीमत चुकानी होगी।

अंत में वह शांत होकर बोला— "जाओ! यह मेरी सलाह नहीं, मेरी अंतिम चेतावनी है। और तुम भी वैसे ही चले जाओ, जैसे सब चले गए।"

यह लेख सिर्फ एक कहानी नहीं, उस मौन प्रकृति का दर्द है जो हम रोज अनदेखा करते हैं।

Musafir Nizam

Musafir Nizam

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