मौन की आवाज़: जब अपने ही अजनबी बन जाएं
ज़िन्दगी के इस सफर में कई बार ऐसा मुकाम आता है जब शब्द कम पड़ जाते हैं और खामोशी चीखने लगती है। मुसाफिर निज़ाम के आज के इस लेख में हम उसी अनकहे दर्द को पिरोने की कोशिश कर रहे हैं जो अक्सर हम अपनों के बीच रहकर महसूस करते हैं।
अज़ब समां है...
दूरी का दर्द
जब कोई बहुत करीब होकर भी दूर होने लगे, तो वह फासला मीलों की दूरी से भी ज्यादा चुभता है। अक्सर हम खुद को सही साबित करने की जंग में इतने थक जाते हैं कि चुप रहना ही बेहतर समझते हैं। लेकिन यह चुप्पी दुनिया को हमारी गलती लगने लगती है।
क्या वाकई सारी गलतियां हमारी होती हैं? या फिर यह वक़्त का एक ऐसा चक्र है जहाँ हम जो भी कहें, वह गलत ही माना जाता है। अपनों का रूठना इंसान को भीतर से तोड़ देता है, खासकर तब जब उसे पता ही न हो कि आखिर उसकी खता क्या है। यह लेख उन तमाम दिल टूटे मुसाफिरों के लिए है जो आज भी किसी की 'रज़ा' का इंतज़ार कर रहे हैं।
उम्मीद है कि कभी तो वो खामोशी टूटेगी और शिकायतों की जगह मुस्कुराहट लेगी।
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