बेरुख़ी

मौन की आवाज़: जब अपने ही अजनबी बन जाएं

ज़िन्दगी के इस सफर में कई बार ऐसा मुकाम आता है जब शब्द कम पड़ जाते हैं और खामोशी चीखने लगती है। मुसाफिर निज़ाम के आज के इस लेख में हम उसी अनकहे दर्द को पिरोने की कोशिश कर रहे हैं जो अक्सर हम अपनों के बीच रहकर महसूस करते हैं।

Feeling Lonely

अज़ब समां है...

अज़ब समां है, जहाँ का हर कोई हमसे रूठा-रूठा लगता है। जाने क्या ख़ता हो गयी है हमसे जो ज़माना झूठा हमें समझता है, यार पता नहीं क्यों मेरे अपने भी मुझसे खफा हैं। जो दिल के पास था वो आज हमसे जुदा है, जाने ये कैसी रज़ा है, पास है वो मेरे पर दूर वो मुझसे रह रहा है। समझ नहीं आता गलती मेरी है या उसकी ख़ता है, क्यों हर गलती की सिर्फ मिलती मुझे सज़ा है।

दूरी का दर्द

जब कोई बहुत करीब होकर भी दूर होने लगे, तो वह फासला मीलों की दूरी से भी ज्यादा चुभता है। अक्सर हम खुद को सही साबित करने की जंग में इतने थक जाते हैं कि चुप रहना ही बेहतर समझते हैं। लेकिन यह चुप्पी दुनिया को हमारी गलती लगने लगती है।

Atmospheric reflection

क्या वाकई सारी गलतियां हमारी होती हैं? या फिर यह वक़्त का एक ऐसा चक्र है जहाँ हम जो भी कहें, वह गलत ही माना जाता है। अपनों का रूठना इंसान को भीतर से तोड़ देता है, खासकर तब जब उसे पता ही न हो कि आखिर उसकी खता क्या है। यह लेख उन तमाम दिल टूटे मुसाफिरों के लिए है जो आज भी किसी की 'रज़ा' का इंतज़ार कर रहे हैं।

उम्मीद है कि कभी तो वो खामोशी टूटेगी और शिकायतों की जगह मुस्कुराहट लेगी।

Related to this story:
Musafir Nizam

Musafir Nizam

● Online Now
×
Hi! Kahan ghumne ka plan hai? Jagah batao, main help karunga!
Thinking...